लेखक - सद्दाम हुसैन .....
तुर्कि - और सीरिया में ऐसा जलजला आया कि सुबह की घड़ी में जो नींद में डूबे थे, वे हमेशा के लिए ही सो गए। धरती कॉपी और कांपती रही। खौफ और मौत की दहशत के वे लम्हे कैसे रहे होंगे ? भोर में 4.17 बजे भूकंप की तीव्रता 73 थी, जो सब कुछ लील गई। घर, मकान, भवन, स्मारक, अट्टालिकाएं, पेड़, बिजली के खंभे, गैस पाइपलाइन और हवाई अड्डे का रन-वे आदि, देखते ही देखते, जमींदोज हो गए। तुर्कि के 10 बड़े शहर 'मलबा' हो गए। जो बसेरे थे, वे खंडहर हो गए। मंगलवार सुबह तक जलजले ने 4365 जिंदगियां छीन ली थीं और 15,000 से ज्यादा घायल बताए गए थे। तुर्कि की 3470 से ज्यादा इमारते जमींदोज हो चुकी है। जो जिंदा बचे हैं, उनके लिए बरबस ही खुदा याद आते है जिसको राखे साइयों, मार सके ना कोय।' जलजला एकबारगी नहीं था तीन बार धरती भयावह रूप से कांपी। अलबत्ता सोमवार की शाम तक तुर्कि और सीरिया के लोग 78 झटके महसूस कर चुके थे। तवाही और बर्बादी के बाद भी मंगलवार को भूकंप का कंपन महसूस किया गया। इन जलजलों ने तुर्कि को एक देश के तोर पर बर्बाद करने में कोई कसर नहीं छोड़ी, क्योंकि तुर्कि गंभीर आर्थिक संकट के दौर से गुजर रहा है। आम चुनाव 14 मई को होने थे, लेकिन विनाश के ऐसे दौर में उन्हें स्थगित किया जा सकता है। इस समय तुर्कि में बर्फीली और कंपा देने वाली सदी पड़ रही है। तापमान शून्य से भी नीचे है। ऐसे दौर में लोग बेघर और बर्बाद हुए हैं। उनकी जिंदगी कैसे चलेगी? बीते 3 सालों के दौरान यह तीसरा बड़ा भूकंप है और 24 सालों के दौरान वहां हजारों नागरिक मारे जा चुके है। विशेषज्ञ 100 सालों के दौरान इसे सबसे भयानक और तीव्र भूकंप मान रहे हैं। इसे 1939 के जलजले की पुनरावृत्ति भी माना जा रहा है, क्योंकि तब भी रिक्टर में स्केल पर तीव्रता 7.8 मापी गई थी। उसमें 30,000 से ज्यादा दुर्भाग्यपूर्ण मौतें हुई थीं। वर्ष 1999 वाले भूकंप में भी करीब 18,000 लोग मारे गए थे, लिहाजा आशंका है कि मौत का आंकड़ा 'अकल्पनीय' स्तर तक बढ़ सकता है। बेशक तुर्कि सबसे खतरनाक भूकंप जो संवेदी देशों में गिना जाता है। वहां ऐसे जलजलों का इतिहास रहा है, लेकिन वह दुनिया के खूबसूरत देशों में भी शामिल है। यह अजीब विरोधाभास है। कुदरत ने एक ही झटके में तुर्कि को ध्वस्त कर बदरूप बना दिया। मलबे का ढेर' बना दिया। कि और असहाय है मनुष्य! वह चांद, मंगल ग्रह तक पहुंच सकता है, लेकिन जमीन के भीतर की करवटों और टकराहटों से नहीं जीत पाया है। इन जलजलों ने तुर्कए, सीरिया को ही तबाह नहीं किया, बल्कि लेबनान, साइप्रस, इराक, यूनान, डेनमार्क, इजरायल और फलस्तीन आदि देशों में भी भूकंप के झटके महसूस किए गए। वहाँ के जान-माल के नुकसान के ब्योरे प्रतीक्षित हैं। तुर्किए में आपातकाल और राष्ट्रीय शोक की घोषणा की गई है। स्कूल-कॉलेज बंद रहेंगे। बहरहाल ये तो सरकारी औपचारिकताएं हैं, लेकिन गंभीर चुनौती यह है कि अब जिंदगियां बचाने की जंग कैसे लड़ी जाएगी। सकारात्मक है कि अमरीका, यूरोपीय देशों से लेकर भारत तक ने सहयोग और मदद के हाथ बढ़ाए है। भारत ने एनडीआरएफ की 100 सदस्यीय टीमों के साथ डॉग दस्ता, मेडिकल टीम और जरूरी दवाएं भेजी है।
