देश व विश्वभर में तेजी घटती गौरैया की संख्या को लेकिन देशभर के पक्षी प्रेमियों व पर्यावरणविदों की गौरैया संरक्षण अभियान के द्वारा रविवार को एक बेविनार आयोजित किया गया। अभियान के संचालक राजीव रंजन पाण्डेय ने अध्यक्षता करते हुए कहा कि आज के विकट समय में गौरैये की आबादी तेजी से घट रही है। इसे पुनः अस्तित्व में लाने के लिए देश के कई राज्यों से पक्षी प्रेमियों को एक मंच पर लाया गया जिन्होंने अभियान को गति प्रदान करने के लिए अपने सुझाव दिए। आयोजन का समापन देववृक्ष महायज्ञ के संस्थापक नीतीश कुमार द्वारा किया गया।
गौरैया संरक्षणगाय,गोबर व गौरैया का क़रीब संबंध
हमारा देश कृषि प्रधान देश है। जिसमें गाय से रिश्ता वैदिक कालीन है। गाय और ग़ोबर से गौरैये का बहुत ही करीबी रिश्ता है। ये बातें भागलपुर के पर्यावरणविद अरविंद मिश्रा ने कही। उन्होंने कहा कि गाय के ग़ोबर में अध पचे अनाज़ होते हैं जिन्हें गौरैया बढ़े ही चाव से खाते हैं। ग़ोबर में पनपने वाले कीड़े को गौरैये अपने चूजे को खूब खिलाती है। कीड़े में प्रोटीन की अधिकता के कारण चूजे तेजी से वृद्धि करते है। लेकिन आज इसकी कमी के कारण गौरैये को पोषणयुक्त आहार नहीं मिलने के कारण पलायन या संख्या कमने का एक मुख्य कारण है।
हमारा अतीत खोता जा रहा है
बक्सर से शिक्षिका उषा मिश्रा ने कहा कि गौरैया हमारी संस्कृति और परिवार का हिस्सा रही है। लेकिन आधुनिकीकरण के कारण इसके अस्तित्व के ऊपर खतरा मंडराने लगा है। आज डिब्बा बंद खाना का कल्चर ने गौरैये को भोजन मुहाल कर रखा है। जरूरत है इसके लिए भी अपने छतों पर दाना-पानी रखें तभी आएगी गौरैया।
गौरैया से ही पंचतत्व की होगी सुरक्षा
पीपल, नीम, तुलसी अभियान के संचालक डॉ धर्मेंद्र पटेल ने कहा कि ये संसार का निर्माण पंचतत्व से हुआ है। इसे बचाने में गौरैये की अहम भूमिका है। इसे बचाने की शुरुआत अपने घरों से करनी होगी,घर जागेगा तो समाज जागेगा और इन्ही के प्रयासों से जैवविविधता को भी बचाया जा सकता है। पी.एम.मिश्रा विज्ञान क्लब दरभंगा के अध्यक्ष नीतिश कुमार भारद्वाज ने कहा कि परिवेश के अनुसार हमें संरक्षण पर बल देना चाहिए, अगर हम गोरैया को संरक्षित करने के लिए कार्य कर रहे हैं तो कई अन्य पशु - पक्षी का भी संरक्षण हो जाता है। उन्होंने अपना व्यक्तिगत अनुभव भी साझा किया।
गौरैया संरक्षण में मीडिया भी आगे आए
एच टी मीडिया दिल्ली से जुड़े अंकुर शरण ने गौरैया संरक्षण में मीडिया की भूमिका को उजागर किया। उन्होंने कहा कि इसके लिए जन जागरूकता अतिआबश्यक है। इसके लिए हर स्तर पर स्थानीय से राष्ट्रिय व वैश्विक स्तर पर इसका प्रचार प्रसार करे। बंद कमरे की बात आम लोगो तक पहुँचाने का एक सशक्त माध्यम है।
कई राज्यों से जुड़े पर्यावरणविद
मध्य प्रदेश से ओम प्रकाश पांचाल,सतानंद पाठक,हितेश पटेल,अभ्युदय केलकर,रानी राज बाकोलिया,उड़ीसा से विचित्रनंद बिस्वाल,ज्ञाना रंजन पंडा, सौम्य रंजन बिस्वाल, उत्तराखंड से राजीव सिंह,असम से महाराणा चौधरी,छतीसगढ़ से अलका देश पांडेय, दरभंगा से नीतीश कुमार भारद्वाज ,राजस्थान से शरद कुमार,हरियाणा से आचार्य रामकुमार बघेल शास्त्री,महाराष्ट्र से जितेंद्र पांडे। इसके अलावे पटना से कई वर्षों से गौरैया के लिए कार्य कर रहे संजय कुमार, बिहार के नालंदा,खगड़िया, मुंगेर, बक्सर,सारण,दरभंगा,जमुई,पटना,भागलपुर, रोहतास,मधुबनी,बँकां सहित अन्य जिलों से जुड़कर गौरैया संरक्षण के अपने अमूल्य विचार प्रस्तुत किए।

