सुगौली संवाददाता अमरुल आलम खान
सुगौली,पू.च: प्रखंड हो या जिला विगत दो साल पहले डाक्टर से मरीज दिखलाने में पुर्जों को समय अवधि 21 दिनो की होती थी लेकिन कुछ जगहों पर हाय रे जमाने की मार 15 दिनो में आ कर अटक गई।लोगो को ना कही चैन मिल पा रहा है और ना ही शुकुन।बस इतना ही नही आशाओं द्वारा मरीज को बहला फुसलाकर अपनी जेब गर्म करने में कोई कसर नही छोड़ती, अधिकांश महिलाएं आशा बनने के लिए प्रयास करती है।मरीज का इलाज सही हो या नहीं चन पैसे के चलते मरीजों की जिन्दगी मौत का फैसला करने में थोड़ा सा भी हिचकिचाहट तक नही होती है।मरीजो को डाक्टरों द्वारा दवा भी इतने रकम का लिख दिया जाता है की मरीजों को लेना मजबुरी बन जाती है,दवा मेडिकलो में पहले से ही डाक्टरों का कमीशन का सेटिंग बना रहता है।अब आप ही लोग बताए इसमें कितनी सच्चाई है या नही।वही मरीजो को जब दवा का पुर्जा मिलता है तो देखते ही कांन व रोंगटे खड़े हो जाते है।अगर दवा मरीज को बीस दिनों का लेना होता है तो सिधे धरले से पैसे की अभाव के कारण दस या सात दिनों का लेना मजबुरी बन जाता है।आखिर क्यों ना ले पैसे ज्यादा सरकार इतनी दवाओं पर टैक्स जो लाद देती है जिससे चुकाने में आम आदमी का पाकिट काटना मे कोई हिचकिचाहट नही होती है।अभी कमीशन का बाजार खुब गर्म चलता नजर आ रहा है।अगर कोई मरीज बेड पर जिन्दगी का आखिरी सांस क्यों ना ले रहा हो कमीशन का बाजार गर्म ही रहता है।यह समस्या एक दिनो की नही लगातार हर दिन मरीजो को झेलना ही पड़ता है।अगर गरीब व्यक्ति जब ज्यादा बीमार पड़ जाता है तो पैसे की अभाव के कारण दिखाने में सक्षम नही होता है तो बीमारी से वह गरीब असहाय व लाचार व्यक्ति मर जाता है।खैर उसकी परवाह किसी को नही होती आज कल तो दौर जांन की कीमत पैसे के तराजू में तोला जाता है।यह है इंसानों का कीमत हाय रे इंसान।उपर वाले ने क्या सोच कर बनाया था एक इंसान यहां आते क्या हो गया इंसान।एक दुसरे के जेब काटने का हॉबी बन गया।सरकार इलाजों के लिए निदान सीधे सरकारी हॉस्पिटल की है लेकिन क्या फैयदा कई ऐसे हॉस्पिटलों में ना तो दवा ना इंजेक्शन ना जांच उपलब्ध होता है सब बाहर लेना पड़ता है एक कहावत बाप ना भैया सबसे बड़ा रुपैया सब कमीशन का खेल और गर्म बाजार है भैया।