ख़्वाजा मुइनूद्दीन चिश्ती ने हमेशा दिन ए हक की दावत देते रहे - मौलाना सद्दाम हुसैन !
झारखण्ड से सेख समीम की रिपोर्ट
ऑल इंडिया पसमांदा मुस्लिम महाज के संथाल परगना प्रभारी मौलाना सद्दाम हुसैन ने प्रेस विज्ञप्ति के माध्यम से बताया कि हजरत ख़्वाजा मुइनूद्दीन चिश्ती का जन्म 1141 ई. में ख़ुरासान प्रांत के ‘सन्जर’ नामक गाँव में हुआ था। ‘सन्जर’ कन्धार से उत्तर स्थित है आज भी वह गाँव मौजूद है लोग उसे सजिस्तान’ कहते है। उनका पूरा नाम ‘ख़्वाजा मुइनूद्दीन चिश्ती रहमतुल्लाह अलैह’ है। ख़्वाजा मुइनूद्दीन चिश्ती ने ही भारत में ‘ चिश्ती सिलसिले’ का प्रचार-प्रसार अपने गुरु ख़्वाजा उस्मान हारुनी के दिशा-निर्देशों पर किया। उनकी प्रारंभिक तालीम- व-तरबियत अपने पिता के संरक्षण में प्राप्त हुई। जिस समय ख़्वाजा मुइनूद्दीन ग्यारह वर्ष के थे तभी इनके पिता का देहांत हो गया। उत्तराधिकार में उन्हें मात्र एक बगीचे की प्राप्ति हुई थी। इसी की आय से वे अपना जीवन निर्वाह करते थे। उनके बाग़ में एक बार हज़रत इब्राहिम कंदोजी का आगमन हुआ। उनकी आवभगत से वे अत्यंत प्रभावित हुए। उन्होंने ख्वाजा मोइनूद्दीन चिशती के सिर पर अपना पवित्र हाथ फेरा और बहुत दुवाएं दी। हिंदुस्तान आने पर वे सबसे पहले एक पेड़ के नीचे इबादत करने के लिए बैठ गए। लेकिन राजा के कर्मचारियों द्वारा यह कहने पर कि यहाँ तो राजा की ऊँटनियाँ बैठती हैं तो वे वहाँ से उठ गए। राजा के ऊँट-ऊँटनियाँ वहाँ से उठ ही न पाए तो कर्मचारियों ने हजरत चिश्ती से माफी मांगी। इसके बाद उनका निवास एक तालाब के किनारे पर बना दिया गया, जहाँ पर ख़्वाजा मुइनूद्दीन दिन-रात निरंतर इबादत में लगे रहते थे। वे अक्सर दुआ माँगते कि दीन ए इस्लाम दुनियां के सभी कोने में फैल जाए। आपको बताते चलें कि ख़्वाजा मुइनूद्दीन चिश्ती 1195 ई में अरब से भारत आए थे। वे ऐसे समय में भारत आए, जब मुहम्मद ग़ोरी की फौज अजमेर के राजपूत राजा पृथ्वीराज चौहान से पराजित होकर वापस ग़ज़नी की ओर भाग रही थी। भागती हुई सेना के सिपाहियों ने ख़्वाजा मुइनूद्दीन से कहा कि आप आगे न जाएँ। आगे जाने पर आपके लिए ख़तरा हो सकता है, क्योकि मुहम्मद ग़ोरी की पराजय हुई है। लेकिन ख़्वाजा मुइनूद्दीन नहीं माने। वह कहने लगे- “चूंकि तुम लोग तलवार के सहारे दिल्ली गए थे, इसलिए वापस आ रहे हो। मगर मैं अल्लाह की ओर से मोहब्बत का संदेश लेकर जा रहा हूँ।” थोड़ा समय दिल्ली में रुककर वह अजमेर चले गए और वहीं रहने लगे। मुइनूद्दीन चिश्ती हमेशा परवरदिगार से दुआ करते थे कि वह उनके सभी चाहने वालों का दुख-दर्द दूर कर दे तथा उनके जीवन को खुशियों से भर दे। ख़्वाजा मुइनूद्दीन चिश्ती ने हमेशा राजशाही, लोभ और मोह आदि का विरोध किया। उन्होंने कहा कि- “अपने किरदार को नदी की तरह पावन व पवित्र बनाओ तथा किसी भी तरह से इसे दूषित न होने देना चाहिए। सभी धर्मों को एक-दूसरे का आदर करना चाहिए और धार्मिक सहिष्णुता रखनी चाहिए। ग़रीब पर हमेशा अपनी रहम दिली दिखानी चाहिए तथा जितना संभव हो उसकी मदद करनी चाहिए। संसार में ऐसे लोग हमेशा याद रखें जाते हैं और मानवता की मिसाल क़ायम करते हैं। ख़्वाजा मुइनूद्दीन चिश्ती जब 89 वर्ष के हुए तो उन्होंने ख़ुद को सब से अलग कर लिया। जो भी मिलने आता वह मिलने से इंकार कर देते। नमाज अदा करते हुए वे एक दिन अल्लाह को प्यारे हो गए !L
