संवाददाता/जामताड़ा
ह्यूमन राइट्स काउंसलिंग के जिला अध्यक्ष अंजुम बानो ने कहा है कि रमजानुल मुबारक की इस बा बरकत महीने मे रोजे रखने वालों को बेइंतहा सवाब मिलता है। और इन दिनों में जो मुसलमान शिद्दत के साथ खुदा त-आला की इबादत और कलाम पाक की तिलावत करेगा उसके गुनाह ऐसे धुल जाएँगे जैसे साफ पानी में गंदा कपड़ा धुल जाता है। रोजे रखने वाले मुसलमान कयामत के दिन अल्लाह के नेक बंदों की शक्ल में पहचाने जाएँगे। पूरे साल भर गुनाह करने वाले इंसान के मन में भी रमजान के मुकद्दस दिनों में यही खयाल बना रहता है कि उसे अपने किए कामों का खुदा को जवाब देना है। यानी रमजानुल मुबारक गुनाहों को न करने की नसीहत देकर इंसान को अपने आमाल अखलाक पर गौर करने का मौका देता है। रमजान का यह पाक और नेकियों भरा माह इंसानी नफ्स को काबू करने की तालीम देता है। साथ ही भूखे की भूख व प्यासे की प्यास को जानने समझने की नसीहत देकर इंसानी फर्ज की याद दिलाता है।दरअसल रोजेदार मुसलमान के जहन पर खुदा की खुदाबंदी और अपनी बंदगी का एहसास होना ही रमजान का असल मकसद है। इन दिनों में रोजेदार बंदा खुदा की बंदगी में अपने आपको इतना मसरूफ कर ले कि उसकी तमाम बुराइयाँ और शैतानी खयालात हमेशा के लिए उसकी जिंदगी से निकल जाएँ। यह माह इंसान को इंसानियत का पैगाम देकर प्यार-मोहब्बत, भाई-चारे, आपसी खुलूस और इंसान को इंसान के लिए मददगार बनने की राह दिखाता है, जिसकी आज सख्त जरूरत है। रमजान माह में अल सुबह सूरज निकलने के पहले से लेकर शाम को मगरिब की अजान होने तक कुछ भी खाने-पीने की हसरत करना तक हराम करार दिया गया है। रोजा अफ्तार करने के बाद ही खाना-पीना जायज है। इसमें गौरतलब बात यह है कि सिर्फ खाना-पीना छोड़ देना अर्थात भूखा रहने का नाम रोजा नहीं और खुदा भी 'सिर्फ भूखे' से खुश नहीं। खुदा तो उन रोजेदारों से खुश रहता है जो रोजे के अरकानों को पूरी अकीदत और ईमान के साथ अदा करते हैं। रोजे की हालत में यह जरूरी है कि रोजेदार हर बुराई से अपने को दूर रखकर रोजे की नफासत और पाकीजगी को पुख्ता करे। सच्चाई की राह पर चलते हुए गिड़गिड़ाकर खुदा से अपने गुनाहों की माफी माँगे और साथ ही खुदा को हाजिर-नाजिर मानकर यह भी अहद करे कि आइंदा गुनाह में शुमार होने वाले काम हम कभी नहीं करेंगे। रोजेदार पाँचों वक्त की पाबंदी के साथ नमाज अदा करें। रमजान के दिनों में पाँचों वक्त फजर, जोहर, असर, मगरिब और इशा की नमाजों के अलावा इशा की नमाज के साथ बीस रकाअत नमाज तराबीह के तौर पर अदा करना लाजिम है। यह नमाज जहाँ तक मुमकिन हो हाफिज ए कुरआन की इमामत में पढ़ना सबसे अफजल होती है। रमजान के दिनों में एक ओर जहाँ बुराइयों से परहेज किया जाता है वहीं दूसरी ओर इंसानी नेकियों को अमल में लाना भी हर मुसलमान के लिए बेहद जरूरी है। इसलिए हर इंसान को चाहिए कि वह इंसानियत के रिश्ते को मजबूत करते हुए रमजानुल मुबारक की नेकियों और रहमतों से पूरी दुुनिया की इंसानी कौम को सराबोर करे जिससे इंसानियत का सर सदा बुलंद रहे, जिससे अमन की फिजा हमारे मुल्क को नई ताजगी से खुशगवार बना सके !
