संवाददाता: साबिर अली
भारत से प्रतिदिन सैकड़ो मजदूर नेपाल में मजदूरी करने के लिए जाने को विवश हैं। सीमावर्ती क्षेत्रों के मजदूर रोजगार के लिए नेपाल जा रहे हैं। वाल्मीकिनगर सीमा पर स्थित कस्टम ऑफिस के सामने नेपाल जाने वाले मजदूरों का जमघट लगा रहता है। जहां से नेपाल के दलाल मजदूरी तय कर के अपने साथ ले जाते है। अभी भारी बारिश होने के कारण धान की रोपनी शुरू हो गई है। नेपाल के पहाड़ी इलाके में मजदूरी का रेट ज्यादा मिलता है। पहाड़ों पर सीढ़ीनुमा खेत होते हैं, जहां खेती का काम काफी दुश्कर होता है। इसके लिए मजदूरी का रेट भी ज्यादा होता है। मजदूरों का कहना है कि बिहार में अगर मजदूरी करने का मौका मिलता तो उन्हें नेपाल जाने की जरूरत नही पड़ती। बतादें कि भारत एक कृषि प्रधान देश है और यहां की 80 फीसदी आबादी खेती पर निर्भर है, बावजूद भारी संख्या में धान की रोपनी के लिए मजदूरों का नेपाल पलायन बहुत सारे सवालो को जन्म दे रहा है।
रोजगार की तलाश में पुरुष और औरत दोनों कर रहे हैं पलायन
सरकार दावे तो बहुत करती है, लेकिन कुछ हासिल नहीं हो पाता है। रोजगार की तलाश में पुरुषों के साथ साथ औरतें भी अपने घरों से निकलकर परदेश जा रही हैं। बतातें चलें कि इन मजदूरों में धांगड़,मुसहर,आदिवासी व थारू जाती के लोगों की तादाद देखी जा रही है। गर्दी दोन,महादेवा, ढंगरहिया,पिपरा,थारू टोला,सेमरा, बैराठी,चम्पापुर,सोहरिया,खरपोखरा आदि इलाके से मजदूर रोजगार के लिए नेपाल का रुख कर रहे हैं।
करोना काल में बंद था सीमा
जसमकारी केलिए बतादें की करोना काल में सीमा बंद था,इस दरमियान मजदूर नेपाल का रुक नहीं कर रहे थे। इन मजदूरों की माने तो 2 सालों में काफी कठिनाई का सामना करना पड़ा है। मजदूरों का कहना है कि 20 से 25 की ग्रुप बनाकर रोशनी करने के लिए जाते हैं। नेपाल से अच्छी आमदनी हो जाती है।
