सेख समीम झारखण्ड रिपोटर
सन् 1972 ई में जब वन्य जीव जन्तु और वन-पर्यावरण की सुरक्षा हेतु निषेधाज्ञा लागू किया गया तब से अयोध्या बुरु (पहाड़) एवं दालमा पहाड़ में होने वाला आदिवासियों और मूलवासियों का वार्षिक शिकार उत्सव प्रायः हतोत्साहित सा हो गया है।आज भी अयोध्या पहाड़ी क्षेत्रों के अगल बगल वासी आदिवासी एवं मूलवासी वार्षिक शिकार उत्सव मनाते हैं लेकिन वह उत्साह अब पूराने जमाने जैसा नहीं रहा।अब अयोध्या पहाड़ी क्षेत्रों के निवासी केवल पारंपरिक रूप से पहाड़ पूजा करते हैं लेकिन शिकार उत्सव अब प्रायः कम पड़ गया है। यहां इस क्षेत्र में सदियों से आदिवासी संस्कृति वाहक लोग बैशाख पूर्णिमा के दिन वार्षिक शिकार उत्सव के रूप में मनाते थे। लेकिन 1972ई में वन सुरक्षा अधिनियम लागू होने से अब केवल औपचारिकता मात्र रह गया है।
कहा जाता है कि अयोध्या पहाड़ी क्षेत्र के आसपास के आदिवासी मूलवासी लोग वार्षिक शिकार उत्सव को एक यौवन शिक्षा के रूप में देखा करते थे। इसमें भाग लेने वाले युवक वीर योद्धा के रूप में मना जाता था। तभी उसकी शादी हो पाता था।जो युवा उस वार्षिक शिकार उत्सव में शिकारी के रूप में शामिल नहीं होते थे उसे युवती और समाज उसको नाबालिग ही समझते थे।इस लिए बैशाखी पूर्णिमा के दिन काफी संख्या में आदिवासी मूलवासी लोग शिकार उत्सव में शामिल होने के लिए निकल पड़ते थे।और पूरे अयोध्या पहाड़ और दालमा पहाड़ भ्रमण करते हुए जंगली जीवों का शिकार करते थे। ये आदिवासी मूलवासी लोग उस क्षेत्र के किसी समतल मैदान पर शिकार के बाद एकत्रित हो जाते थे। वहां वे लोग एक दूसरे से मिलते और एक दुसरे से परिचित होते थे।वे लोग अपने अपने शिकारी दल लेकर उस मैदान में एकत्रित हो जाते थे जहां आदिवासी मूलवासियों का मेला लग जाता था। बैशाखी पूर्णिमा के दिन शिकार उत्सव का आखिरी दिन होता था जब वे लोग मैदान में एकत्रित होकर एक-दूसरे से मिलते थे।यह आदिवासी मूलवासी का परंपरागत सदियों से चलती आ रही थी। इतिहासकार बताते हैं कि अयोध्या पहाड़ को संथाली भाषा में अयोध्या बुरु कहा जाता है।इसी अयोध्या बुरु के आसपास क्ई जनजाति समाज सदियों से रहते आए हैं। अयोध्या पहाड़ या बुरु को घिरे क्ई नदियों का गमन हुआ है जिसमें दामोदर नदी,कंसावती नदी,शिशल्ई नदी,कोमारी नदी जैसी कई नदियां हैं।
अयोध्या पहाड़ बहुत बड़ा भूभाग में फैला हुआ है।इसी क्षेत्र में वन्य संस्कृति वाहक जनजाति संस्कृति के भूमिज ,कोल, पहाड़िया, खैरवार, खड़िया, घटवाल, भुइंया,मोहली, कुर्मी, महतो, कुम्हार, लोहार,कमार,गंझू,असुर,वीरहोर,तांती, मुंडा, जैसे समाज के लोग रहा करते थे। यही लोग आदिवासी संस्कृति और परंपरानुसार वार्षिक शिकार उत्सव मनाते थे। लेकिन सरकारी कानून के मुताबिक यह आदिवासी मूलवासी मेला को और वन्यजीव जन्तुओं की शिकार को गैरकानूनी माना गया था। तर्क था कि इस प्रकार की झुंड़ के झुंड के लोगों के आवागमन से पेड़ पौधे काफी संख्या में रौंद दिए जाते हैं।साथ ही वन्यजीव जन्तुओं की निर्मम हत्या की जाती है।उसे रोक लगाने के लिए बौद्ध अनुयायियों ने सरकार से मांग जोरदार तरीके से की थी। बौद्धों का कहना था कि भगवान बुद्ध का जन्म बैशाख पूर्णिमा के दिन हुआ था।इस लिए इसे बुद्ध पूर्णिमा के रूप में मनाया जाना है। यह भी तर्क दिया गया कि भगवान बुद्ध अहिंसा के पूजारी थे , इसलिए उनके जन्मदिन पर बुद्ध पूर्णिमा के दिन इतनी भारी संख्या में वन्यजीवों की हत्या क्यों की जाती है।इस पर कानूनी रूप से रोक लगनी चाहिए। कहा जाता है कि इसी मांग के चलते तत्कालीन सरकार ने 1972ई में इस पर प्रतिबंध लगाया दिया था।इस पर शीघ्र प्रतिबंध लगाते हुए कहा गया कि वन्यजीव जन्तु एवं पेड़ पौधे भारतीयों का एक बहुत बड़ी संपत्ति है और एक धरोहर माना गया है। अहिंसा धर्म प्रचारक भगवान बुद्ध के जन्म दिन पर इस तरह के कार्य को अपवित्र माना है।
वर्तमान समय में कुछ आदिवासी संगठन पुनः इसे जारी रखने की मांग कर रहे हैं।इन जनजाति आदिवासी मूलवासी संस्कृति एवं वन्य संस्कृति वाहक समाज का कहना है कि यह संस्कृति बहुत पुरानी है। इसमें हमलोग अपने देवी देवता, पहाड़ जंगल पेड़ पौधे आदि प्रकृति को पूजते हैं। हमलोग प्रकृतिवाद हैं।हमारा वार्षिक शिकार उत्सव हमारे जीवन से जुड़ी हुई हुई। इसमें कृषि, जीवन यापन, संस्कृति, शादी व्याह, संसार बसाने का शिक्षा जैसे चीजें जुड़े हुए हैं।
अब सवाल उठता है कि कौन आगे है। आदिवासी जनजाति की संस्कृति और परंपरा या बौद्ध परंपरा अहिंसा।
बैशाखी पूर्णिमा को शिकार उत्सव यौवन शिक्षा आगे से है या बुद्ध पूर्णिमा बौद्धिक आगे से है।
