मोतिहारी, पू. च : महिलाओं के लिए शिक्षा सिर्फ एक अधिकार नहीं है, बल्कि यह उनके आत्मनिर्भर बनने और समाज में समानता स्थापित करने का सबसे महत्वपूर्ण साधन है। बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर ने कहा था कि "शिक्षा उस शेरनी का दूध है, जिसने पिया उसने दहाड़ा है।" यह कथन महिलाओं की शिक्षा के महत्व को बहुत ही प्रभावी ढंग से स्पष्ट करता है।
शिक्षा न केवल महिलाओं को उनके अधिकारों के प्रति जागरूक बनाती है, बल्कि उन्हें आत्मनिर्भर बनने और समाज में अपनी पहचान स्थापित करने में भी सक्षम बनाती है। भारत जैसे देश में, जहां हजारों वर्षों से महिलाओं को प्रताड़ना और भेदभाव का सामना करना पड़ा है, शिक्षा उनके लिए गुलामी की जंजीरों को तोड़ने का सबसे सशक्त हथियार है। आजादी के 75 साल बाद भी गांवों और कुछ शहरी क्षेत्रों में महिलाओं की स्थिति में कोई खास सुधार नहीं हुआ है। आज भी समाज के एक बड़े हिस्से में महिलाओं को सिर्फ घर की चारदीवारी तक सीमित रखने और खाना बनाने के लिए ही योग्य समझा जाता है। यह मानसिकता सिर्फ महिलाओं के विकास में बाधा नहीं है, बल्कि पूरे समाज के विकास को अवरुद्ध करती है। शिक्षा इस मानसिकता को बदलने का सबसे प्रभावी साधन है। जब महिलाएं शिक्षित होती हैं, तो वे न केवल अपनी सोच को व्यापक बनाती हैं, बल्कि समाज में बदलाव लाने की ताकत भी रखती हैं। महिला सशक्तिकरण का अर्थ है महिलाओं को उनके अधिकारों और कर्तव्यों के प्रति जागरूक करना, उन्हें सामाजिक, आर्थिक, और राजनीतिक रूप से स्वतंत्र बनाना। शिक्षा इस सशक्तिकरण की नींव है। शिक्षा के माध्यम से महिलाएं निर्णय लेने, समस्याओं को हल करने, और समाज में अपनी आवाज उठाने के काबिल बनती हैं। शिक्षा से महिलाओं में आत्मविश्वास बढ़ता है, जो उन्हें हर चुनौती का सामना करने के लिए तैयार करता है। शिक्षित महिलाएं न केवल अपने परिवार को बेहतर ढंग से संभाल सकती हैं, बल्कि समाज और देश के विकास में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं। शिक्षित महिलाएं रोजगार के बेहतर अवसर प्राप्त कर सकती हैं। वे न केवल आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनती हैं, बल्कि परिवार की आर्थिक स्थिति को भी सुधारती हैं। शिक्षा महिलाओं को अपने अधिकारों के प्रति जागरूक बनाती है। वे बाल विवाह, दहेज प्रथा, और घरेलू हिंसा जैसी सामाजिक कुरीतियों के खिलाफ आवाज उठाने में सक्षम होती हैं। एक शिक्षित महिला अपने बच्चों को बेहतर शिक्षा और संस्कार दे सकती है। इससे न केवल उनका परिवार, बल्कि पूरा समाज प्रगतिशील बनता है। भारत सरकार ने महिलाओं की शिक्षा और सशक्तिकरण के लिए कई योजनाएं चलाई हैं, जैसे: बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ योजना, सुकन्या समृद्धि योजना, राष्ट्रीय महिला सशक्तिकरण मिशन, उज्ज्वला योजना। हालांकि, इन योजनाओं का उद्देश्य बहुत अच्छा है, लेकिन कई महिलाएं इनसे अनजान हैं। इसका कारण है योजनाओं का सही ढंग से प्रचार-प्रसार न होना। सरकार को न केवल इन योजनाओं के बारे में जागरूकता फैलाने की जरूरत है, बल्कि यह सुनिश्चित करना भी जरूरी है कि योजनाओं का लाभ वास्तव में जरूरतमंद महिलाओं तक पहुंचे। महिला सशक्तिकरण में पुरुषों की भागीदारी भी उतनी ही महत्वपूर्ण है जितनी महिलाओं की। पुरुषों को यह समझना होगा कि महिलाओं का सशक्तिकरण सिर्फ महिलाओं के लिए ही नहीं, बल्कि पूरे समाज के लिए फायदेमंद है। जब पुरुष और महिलाएं कंधे से कंधा मिलाकर काम करेंगे, तभी एक समतामूलक और प्रगतिशील समाज का निर्माण होगा। शिक्षा के साथ जिम्मेदारी भी आती है। यदि शिक्षा का सही उपयोग किया जाए, तो यह समाज के विकास में मदद करती है। लेकिन यदि इसका दुरुपयोग किया जाए, तो इसके गंभीर परिणाम हो सकते हैं। एक शिक्षित महिला अपने परिवार और समाज को उन्नति के पथ पर ले जा सकती है, लेकिन अगर वह अपने ज्ञान का गलत उपयोग करती है, तो इसका नकारात्मक प्रभाव पूरे समाज पर पड़ सकता है। जब महिलाएं शिक्षित और सशक्त होंगी, तभी हम एक समान, न्यायपूर्ण, और प्रगतिशील समाज का निर्माण कर पाएंगे। बाबा साहेब के शब्दों में, "शिक्षा शेरनी का दूध है," और यह दूध केवल महिलाओं को ही नहीं, बल्कि पूरे समाज को ताकतवर बनाने का काम करता है।
